सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

एक छुपी कहानी

हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !
सिमटी हुई सी,
कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !
सिमटी हुई सी,

कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी !
झांकते है कुछ लम्हे कुछ यादे,
उन सिलवटो और निशानों से !
और सुनाते हें एक कहानी उस सफर की,
जो उसके धुलने के साथ ही  भुला दिया जाएगा !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !!
.
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राजू का मिटटी से सना स्कूल का नीला शर्ट
बता रहा हें कि आज उसने खेला है फुटबाल
क्लास छोड़ कर !
कुछ भीगी सी आस्तीने गवाह हें
कि पसीना फिर उसने बाज़ुओ से ही पौछा है !
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पड़ोस कि आंटी की
लखनवी डिजाईनर साड़ी पर लगे सब्जी के निशान
बता रहे है भोज में आये मेहमानों कि भूख को !
रोज़ मोहल्ले का डान बनकर घूमने वाले
महेश कि शर्त फटी हुई हें आज,
वो पिट कर लौट रहा है या हवालात से !
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बड़े भैया के एक बाजू से
महक रहा है जनाना इत्र,
उस लड़की का
जिसके हाथ थाम जनाब सिनेमा देख आये हें !
पिताजी का सिलवटो और पसीने से भरा शर्ट
हिसाब देता हें उन पैसो का,
जो हम बेफ़िक्री से उड़ाते हें !
माँ की साड़ी में गंध और कालिख हें कोयले की,
लगता हें गैस फिर खत्म हो गई है !
आज फिर रोटी खानी होगी चूल्हे की !
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मेरे दोस्त के टी शर्ट में बू हें धुए की सी,
शायद कही गली में छुप कर वो सिगेरेट सुलगाता होगा !
दादाजी कि उस पुरानी धोती से एक अजीब गंध आती हें
शायद तजुर्बे कि महक होगी !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
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चौराहे पर बैठे उस बूढ़े भिखारी का फटा कुर्ता
दशको से नहीं धुला,
उसमे छुपी हें अनगिनत सच्चाइयाँ
और लाचारी भरे लम्हे कई,
पर मोटे उपन्यासों को पढ़ने का वक्त किसी के पास नहीं !
पहाड़ के उस पुराने मंदिर में
जहा अब कोई नहीं जाता
एक ध्वजा लहराती हें,
कहती हें कहानी उन दिनों कि
जब इंसा इतना नास्तिक न था !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
.
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अक्सर ये कहानिया वक्त बा वक्त धो दी जाती हें
एक नई इबारत लिखने को,
पर कुछ कहानियों को संजोया जाता हें सुनाने को !
जैसे कि मेरी अलमारी बड़े जतन से रखा वो रुमाल
जो फिरंगी मेम का चुराया था,
मानो महक आती हें उसमे परदेस की !
हाँ! और जैसे वो ‘मफलर’
जो भैया को उनकी सहेली ने दिया था शायद,
छूने भी नहीं देता किसी को
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें
.
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लेकिन अलमारी में बिलकुल पीछे,
एक फौजी वर्दी टंगी हें चचाजान की !
घर के बड़े कभी कभी अकेले में
उसे देख कर रो लिया करते हें !
उस वर्दी पर आखिरी कहानी के शायद कुछ ज़ख्म बचे है
अब उसकी सिलवटो में कोई नई कहानी नहीं भरता
क्योंकि उन हरी स्लेटी सतहो लिखने वाला
लंबी छुट्टियों पर गया हें !!
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

आईये ! और बचपनों को सुनहरा बनाएं ! :)

पता है 'चिल्ड्रन्स डे ' है तो सब हमेशा की तरह फिर से नोस्टैल्जिक हो जायेंगे .क्या करें सबसे प्यारा बचपन ही तो होता है .न कोई टेंशन .न कोई प्रेशर .पर कुछ लोगों के लिए यही बचपन बेहद खौफनाक होता है .बेहद बुरी ,कडवी यादों से जुड़ा होता है क्यूंकि यही वो अवस्था भी होती है जब हम मासूम ,कमज़ोर और दुनिया की रीत से हटके होते हैं ....और इसीलिए हमारे इसी भोलेपन का फायदा या तो समाज या परिस्थितियाँ उठा लेती हैं .पर अब आप समर्थ हैं .कम-से -कम अगर आपका बचपन परफेक्ट नही रह पाया तो आप ऐसे अनगिनत बच्चों का बचपन सँवारने में मदद तो कर सकते हैं न .

एक और बात जो वैसे तो व्यक्तिगत राय है पर शायद काफी सारे लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि इस दुनिया में इतने सारे बच्चे 'बिन माँ -पापा ' के ज़िन्दगी गुजारते हैं .और हमारे यहाँ हम बस 'अपना खून अपना ही होता है ' का बड़ा ही बेसुरा राग अलापते रहते हैं .उनसे पूछिए जो अपनी संतान के सुख के लिए तड़पते रहते हैं ,उनके लिए ये बच्चे ही रौशनी लाते हैं . फिर क्यूँ खुद अपनी औलाद को जनम देना हमारे यहाँ अति आवश्यक समझा जाता है .शादी होने के बाद ही समाज का सारा दारोमदार अपने कन्धों पर ढोने वाली तथाकथित आंटियाँ कैसे जब देखो तब शुरू हो जाती हैं ....खुशखबरी कब सुना रही हो .गोया कि अब ज़िन्दगी में खुशखबरी के लिए और कोई वजह ही नही है!! और कैसे बच्चा गोद लेने पर समाज तो छोडिये परिवार भी नाक भौंह सिकोड़ता है .क्यूँ ? बच्चे का खून का रंग सफ़ेद तो न हो जाएगा और वैसे भी बच्चा आपकी परवरिश पर निर्भर करेगा .फिर क्यूँ हम ये खून का मोह पालते बैठते हैं .जानते हैं हम जबकि कि अपने खून पर तो बरसों से भरोसा पालते आये हैं पर वे ही खून के आंसू रुला देते हैं कई बार .तो एक बार प्यार और अपनेपन को तरसती इस नन्ही सी जान को अपने आँगन में पालकर तो देखिये .कैसे ज़िन्दगी भर आप के एक बूँद प्यार के बदले आप पर प्रेम और सम्मान की बरसात करेगा . 

और आप से इसलिए यह बात कर रही हूँ क्यूंकि आप से नही तो किससे!! आप नयी पीढ़ी के हैं .आप शुरुआत करेंगे तो आप को देखकर और लोग आगे आयेंगे और आप राज़ी होंगे तो आपके परिवार वालों को भी आप राज़ी कर ही लेंगे !! हाँ पर एक ज़िन्दगी रोशन करने का मतलब ये नही कि अब और किसी रोते और मायूस बच्चे के चेहरे पर खुशियाँ नही बिखेरने की कोशिश करेंगे .क्यूंकि एक को तो आपने कहीं न कहीं अपने लिए अपनाया (खुशियों का एक्सचेंज म्यूच्यूअल होता है भई !  ) पर यहाँ पर आपका इंसानी फ़र्ज़ ,एक समर्थ होने का फ़र्ज़ ख़तम नही हो जाता !!  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

'पतझड़ '

एक्ज़ाम हॉल में टाइम ख़तम होने के बाद भी अगर आप को बिठाकर रखा जाए तो आप बेशक बाहर निकलने के लिए अधीर होते होंगे ,सब होते हैं ,पर क्या करें अब रूल्स तो रूल्स हैं .

खैर इसी तरह कुछ मेरे साथ हुआ -दिमाग की झुंझलाहट को रोकने के लिए खिड़की के बाहर नज़र घुमाई तो फिर से भाव झरने लगे मस्तिष्क में .....दस मिनट में जैसा दिमाग और आँखों के बीच के तारतम्य से जुड़ता गया ,कुछ कविता जैसा बनता गया ....!!

'पतझड़ ' 

अपना हरापन खो चुके ये पत्ते ,
कुछ 'मन ' मसोसते से जान पड़ते हैं ;
झुर्रियों वाले ,भूरे ,सिकुड़े ,रौंदे ,कुचले ये पत्ते ;
कुछ हैं अभी प्रौढ़ता की ओर जा रहे ,
सो हैं थोड़े पीले से ;

जब ग़लती तले दब जाते हैं ये
हल्का सा शोर मचाते हैं ,
और जब ज्यादा दब जायें तो ;
कहते हैं हम -परे हटो इनसे क्यूंकि
बड़ी कर्कश सी ध्वनि है यह तो ,

दोस्तों ! कुछ सुना सुना सा नही लगता यह वाकया आपको ,
हमारे ,आपके घरों सा ही तो है .

इन दिनों 'उन्ही ' माँ-बाप की आवाज़ बड़ी चुभती है ,
उनकी कराह ,उनकी नाराजगी और गले की ख़राश भी दर्द देती है सर में ,
करती है चिढ़चिढ़ा ;
जनाब ! अब तो समझ ही गये होंगे आप कि वो 'मसोसते मन ' कौन हैं !

लब्बोलुआब है कि हर बसंत का एक पतझड़ आता है ;
काश यह समझते हम ;

नही तो दिन वो भी इक आएगा जब पाएंगे खुद को मसोसते हम 'मन' !! 









बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

धर्म और उसके मायने ?

                                हिन्दू हो ,मुस्लिम हो या क्रिस्चियन या कोई और .....धर्म सब एक जैसे हैं मेरे लिए और सभी का मूल उद्देश्य भी एक ही होता है पर क्यूँ ऐसा है कि हम उस धर्म के पीछे ,उसके रिवाजों के पीछे की भावनाओं को तो भूल जाते हैं पर उन रिवाजों को बड़े अच्छे से फॉलो करते हैं ! क्या परंपरा को विवेक और ह्रदय के तराजू पर तौलकर हम ये खुशियाँ नही मना सकते ....क्या सिर्फ 'ऐसा तो होता ही है ' की वजह से ही हम अपने दिलो दिमाग को ठन्डे बस्ते में डालकर करेंगे ?; शायद -शायद कभी तो पढ़े लिखे और समझदार मानुस (भावना छोडिये आप लॉजिक की बात कीजिये ) उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते होंगे ! 

मुझे पता है कि ये विवाद का मुद्दा है पर मैं पढ़े लिखे ,समझदार दोस्तों की बात कर रही हूँ ,हर धर्म के ,हर मज़हब के !

क्या कभी आपने ये सवाल नही उठाया कि माँ आप के करवाचौथ करने से सचमुच पापा की उम्र बढ़ जाएगी और अगर आप ये व्रत की बजाय सचमुच उनकी सेहत के लिए कोई उपाय करें तो कैसा रहेगा ? या घनघोर पूजा पाठ से जीवन सुखमय बनता है या अच्छे से ,मेहनत से काम करके छोटी सी प्रार्थना करके भी इंसान खुश रह सकता है ,हमारे यहाँ हिन्दू धर्म में भी काफी समय पहले तक देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ाई जाती थी ....माँ असुरों के नरमुंड से प्रसन्न होती थीं शायद इसलिए क्यूंकि वे विनाशकारी और बुरे थे पर ये मासूम बच्चों,बच्चियों और पशुओं की बात कहाँ से आई ....नही पता ! ईद पर होने वाली बलियों की जहाँ तक मुझे जानकारी है ,उसका लॉजिक भी आजतक नही समझा मुझे .....मतलब जान लेने पर जश्न या जान लेकर मनाया जाने वाला जश्न .....हर एक धर्म के अपने नकारात्मक पक्ष हैं ....हम हिन्दु भी कम नही हैं ...ढकोसले निभाने के मामले में .....दूसरों को क्या कहें ....ये बताओ हम सबके घरों में कुछ न कुछ ऐसा ही परंपरा के नाम पर फॉलो होता है पर उसके पीछे का कारण जाने की कोशिश कब की हमने ? और की तो क्या उस कारण के साथ साथ वो रिवाज़ को कायम रखने का तरीका बदलना चाहिए वक़्त के साथ ?

# इतने त्यौहार आते हैं न इस देश में ....कि समझ नही आता कि हम भारत वाले काम कैसे और कब कर लेते हैं ! एकता में अनेकता ,विविध रंग भारत के वगैरह वगैरह सब सही है पर क्या उस एसेंस को कायम रख पाए हैं हम ?


गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

प्यारे सचिन

                                            प्यारे  सचिन 


कोई  कहता  genius, तो  कोई कहता  महान  तुम्हे .
कोई  मास्टर  कहता , तो  कोई कहता  भगवान्  तुम्हे .
हाँ  तुम  ही  तो  हो  महान ,
हाँ  तुम  ही  तो  हो  भगवान् .
हाँ  तुम  ही  तो  हो  हमारे  प्यारे  सचिन .
कोई ……………!

[01] हाँ  मैंने  देखा  है  तुम्हे  महान  बनते ,
मैंने  ही  नहीं  सबने  देखा  है  तुम्हे  भगवन  बनते .
हर  उछाई को  छोटा  करते  खुद  को  ऊपर  उठाते ,
किस्मत  खुद  अपने  हाथों  बनाते .
हाँ  तुम  ही …………………………………!

[02] हाँ  याद  है  मुझे  16 साल  का  सचिन ,
घंटो नेट पे मेहनत  करता  सचिन .
चोट लगने  पर  भी  बिलकुल  नही  घबराता  सचिन ,
बुलंदी  के   आसमान  से  उछा उठता  सचिन .
हाँ ! सही  है  तुम  ही  तो  ………………..!

[03] हाँ  मुझे  याद  आती  है , धुंधार  बल्लेबाजी  सचिन  की ,
असंभव  को  संभव   बनती  इच्छा  सकती  सचिन  की .
चोटों से  उबरकर  हर  नयी  शुरुआत  सचिन  की ,
रिकॉर्ड  बनाती  बिगडती  हर  नयी  पारी  सचिन  की .
हाँ  सब  कहते  हैं , तुम ……………………………………!

[04] हाँ  मुझे  याद  रहेगा  हर  बार  उम्मीदों  का  बोझ  कन्धों  पर  लड़ना ,
टीम  की  हर  उम्मीद  पर  खरा  उतरने  की  कोशिश  करना .
37 की  उम्र  में  16 के  सचिन  सा  दोहरा  सतक  लगाना ,
हर  सीमा  को  पकड़ना   फिर  भी  कदम  धरती  पर  रखना .
हाँ  मैं  कहता हूँ , तुम …………………………………..!

[05] हाँ  अब  देख  रही  है  दुनिया , तुम्हे  सीमाओं  से  पार  निकलते ,
हर  आलोचना  का  जबाब  शालीनता  से  देते .
टीम  की  जरुरत  पर  अपने  अंदाज  में  बदलाव  करते .
भारतीय  टीम  में  सीनियर  का  फ़र्ज़  bakhubia  निभाते .
हाँ  अब  कह  रही है  दुनिया , तुम ………………………!

[06] हाँ  देखा  रहे  भारतवाशी , सफलता  के  आश्मान  पर  चाँद  से  चमकते  तुम ,
20 साल  बाद  भी  नयी  पारी  खेलते  तुम .
षथोइयोन को  जिम्मेदारी  सिखाते , और  निभाते  तुम ,
इंसान  से  महान  और  महान  से  भगवान्  बनते  तुम .
हाँ  सच  है , तुम  ही ………………………..!

[07] सचिन  हो  खुद  को  ही  समझते  सचिन ,
माहं  हो  भगवान  हो  पर  हो  हामारे  pyaare सचिन .
खेल  की  जान  भारतीय  क्रिकेट  की  शान  हो  सचिन ,
हर  भारतवाशी  का  मान  और  बल्लेबाजी  की  पहचान  सचिन .
हाँ ! दिल  से  कहते  हैं  हम , तुम ……………………..!
हाँ  तुम  ही  तो  हो  हमारे   ‘’प्यारे  सचिन ’’!

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

नवरात्री पर कविता

नवरात्रि कि शुभकामनाएं!


नव रात्री नव रात है,नव जीवन संदेश \
तन मन भवन शुद्ध रखो,आये माँ किस भेष \\
भक्तगण नव रात्री में,रखते हैं उपवास \
कन्या पूजन भी करें,माँ का यही निवास \\ 
देखो कैसे सज रहा,माता का दरबार \
माँ के दर्शन को लगी,लम्बी बहुत कतार \\ 
जयकारों से मात के,गूंज रहा दरबार \
माता का आशीष ले,पायें शक्ति अपार \\ 
गरबा रमती मात है,चहुँ दिसि उत्सव होय \ 
भक्त यहाँ सुख पात हैं,सबके मंगल होय \\
हवन अरु जागरण करे,नवरात्री सब लोग \
देती माँ आशीष जो,मिटे क्लेश सब रोग \\
धन धान्य और सम्पदा,वैभव खिल खिल जाय \
निश दिन पूजे मात को,सब सम्भव हो जाय \\






प्रथम दुर्गा श्री शैलपुत्री
आदिशक्ति श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनके पूजन से मूलाधर चक्र जाग्रत होता है, जिससे साधक को मूलाधार चक्र जाग्रत होने से प्राप्त होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

द्वितीय दुर्गा श्री ब्रह्मचारिणी
आदिशक्ति श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोप तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इनकी उपासना से मनुष्य के तप, त्याग, वैराग्य सदाचार, संयम की वृद्धि होती है तथा मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता।

तृतीय दुर्गा श्री चंद्रघंटा
आदिशक्ति श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

चतुर्थ दुर्गा श्री कूष्मांडा
आदिशक्ति श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा के पूजन से अनाहत चक्र जाग्रति की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।

पंचम दुर्गा श्री स्कंदमाता
आदिशक्ति श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा मृत्युलोक में ही साधक को परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वंयमेव सुलभ हो जाता है।

षष्ठम दुर्गा श्री कात्यायनी
आदिशक्ति श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। श्री कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौलिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।

सप्तम दुर्गा श्री कालरात्रि
आदिशक्ति श्रीदुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए। श्री कालरात्रि की साधना से साधक को भानुचक्र जाग्रति की सिद्धियां स्वयंमेव प्राप्त हो जाती हैं।

अष्टम दुर्गा श्री महागौरी
आदिशक्ति श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन और अर्चन किया जाता है। इन दिन साधक को अपना चित्त सोमचक्र (उर्ध्व ललाट) में स्थिर करके साधना करनी चाहिए। श्री महागौरी की आराधना से सोम चक्र जाग्रति की सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

नवम् दुर्गा श्री सिद्धिदात्री
आदिशक्ति श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम् दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त निर्वाण चक्र (मध्य कपाल) में स्थिर कर अपनी साधना करनी चाहिए। श्री सिद्धिदात्री की साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता।





बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

आओ बच्चों हम भी गांधी-लाल-बहादुर बन जाएँ

अपने इस चमन के दो निराले और प्यारे प्यारे फूल , इन्हें नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी -जन्मदिन 2 अक्टूबर 1869 काठियावाड़ पोरबंदर गुजरात – मृत्यु – नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारने से 30.जनवरी 1948 दिल्ली (भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति दिलाने में हमारे शहीदों के साथ महान योगदान , अहिंसा के मतवाले , छुआ-छूत भेद भाव मिटाने वाले , अमन चैन फैलाने वाले , सत्य और अहिंसा के प्रयोग और आत्म-शुद्धि के प्रसार कर्ता )
प्रिय लाल बहादुर शास्त्री भारत के तीसरे और स्थायी तौर पर दूसरे प्रधानमंत्री -जन्म दिन 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय उत्तर प्रदेश -देहावशान रहस्यमय ताशकंद में 11 जनवरी 1966 ,लाल बहादुर शास्त्री न केवल एक महान नेता थे, बल्कि राष्ट्रीय खजाना भी थे। वह प्रेम करने वाले व्यक्ति थे इमान की प्रतिमूर्ति थे और वे देश के प्रधानमंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ थे।
                         आओ बच्चों हम भी गांधी-लाल-बहादुर बन जाएँ

आओ बच्चों हम भी
गांधी-लाल-बहादुर बन जाएँ
“लाल” बनें जो भारत माँ के
सब अनीतियाँ टल जाएँ !!
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सत्य अहिंसा ईमाँ शासन
छुआ-छूत ना भेद रहे
चिड़ियों सा उन्मुक्त फिरें हम
प्रेम सुशासन जग लायें !
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चरखा-खादी-आजादी ने
कैसे – कैसे रंग दिखाया
कितने कष्ट सहे लालों ने
हमको “ऐसे” गले मिलाया !
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संत -फ़कीर ऋषि मुनि ‘इन’ से
आओ ‘हम’ भी चोला रंग लें
अच्छाई करुणा अनुशासन
सत्य , अहिंसा, समता व्रत लें !
——————————————–
‘काँटा’ दुनिया हमें कहे भी ना विचलित हों
फूल’ चमन की रक्षा करके खुशियाँ भर दें
गुल-गुलशन इस खिले चमन में खुश्बू ले के
गुन -गुन करते’ भ्रमर’ सा उड़ सन्देशा दे दें !
—————————————
‘प्रेम’ से जग को जीत सकें हम अटल सत्य ये
आत्म-शुद्धि कर हर दिल राज करें भाई
लहरे गंगा, फहर-फहर फहराए तिरंगा
भेद भाव ‘हर’ बनें एक तो पायें सच्ची आजादी !
———————————–
गांधी -बापू राष्ट्र -पिता तुम
‘लाल’ बहादुर सच्चे लाल
‘अमर’ सदा तुम माँ के प्यारे
जन-गण मन में तेरा राज !
अमन चैन के उड़ें कबूतर
शान्ति -शान्ति अपना पैगाम !
—————————————–

रविवार, 1 सितंबर 2013

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये / दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये 

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

मयस्सर=उपलब्ध
मुतमईन=संतुष्ट 
मुनासिब=ठीक
                                                - दुष्यंत कुमार

सोमवार, 26 अगस्त 2013

मुंबई डायरीज़ –भाग एक


(मेरी  लिखी गयी कुल 4 -5  कविताओं में से ये ‘लोकल ‘ के लिए टिकट की कतार में लगे हुए बाहर ठीक कान्जुर स्टेशन से सटे रहवासों को देखकर ;दो तरह की जिंदगियों के विरोधाभास पर उमड़ते ख्यालों से प्रेरित होकर लिखी गयी है ....लोकल में अगर आपको बैठने को मिल जाए और हाथ में डायरी पैन हो ,लिखने की खुजली हो रही हो तो क्या ही बात ! खैर आगे के पन्ने भी मुंबई से जुड़ी यादों से भरे हैं   )

एक ऐसी भी ज़िन्दगी !
 
झरोखे से झाँकती ज़िन्दगी
ठीक रेल की पटरियों से सटी ;
सरपट भागती रेलें औ’
उससे भी तेज़ भागती यह ज़िन्दगी ,
कहीं तो आलीशान महलों से
सजा है जीवन
तो कहीं मजबूर है कोई
माचिस के डिब्बों से ‘घर’ के हिस्से में
ज़मीं भी ज़रा कुछ कम ही आती है
कुछ अटके हैं आसमां और ज़मी के बीच
तो कुछ रातें कटती हैं तारे गिनते
वहीँ पड़े हैं कुछ भीगे तौलिये
तो कबूतरों ने भी सोचा चलो !
चलो ...आज करें यहीं बसेरा ..
गर भूल गये हों आप
रफ्तारों को ,कतारों को ....
अरे ट्रेन तो पकड़ी ही होगी आपने
आज चलो उसी ‘घर ‘ को चलें

यह रंग भी है अजब ज़िन्दगी का ,
जो दूर से तो फबता है
पर नजदीकियां आँखों में देती हैं चुभन !
ठीक वैसे ही जैसे ये भागती भीड़
यूँ तो नही करती असर
पर जब हम हों हिस्सा उस ‘सैलाब ‘ का
तो कुछ भुनभुनाहट आ जाती है ,
कभी त्योरियाँ चढ़ जाती हैं
तो कभी ‘बढती आबादी ‘लगती खटकने ऐसे ही
वह गज भर की जगह
एक घरौंदा
किसी का ‘सब कुछ ‘ होता है
ताउम्र मोल चुकाएगा कोई उसे अपना बनाने के लिए

ऐसी कितनी जिंदगियों को पार कर
होता है आज का यह ‘ सफ़र ‘ पूरा
और फिर ऐसी भी होती है इक ज़िन्दगी !

मुंबई के ये रंग हर दफ़ा  जब भी मैं आई.आई. टी की दुनिया से बाहर निकलती हूँ मुझसे रूबरू होते हैं.सपनों का शहर –ग्लैमर की चकाचौंध ,कुछ नया करने का सोचने वाला दिमाग ;सभी का यह शहर बाँहें  फैलाये स्वागत करता है –लोकल में बैठे बैठे आज फिर  मैं इसी ज़िन्दगी के अलग-अलग पन्नों को पढ़ रही हूँ !

रहते हुए तीसरा बरस है मेरा यहाँ पर एक घर मेरा भी है –मेरा ठौर ,मेरा हॉस्टल ....कभी कभी सोचती थी कि यार लड़कियों (खासकर ) के लिए मुंबई ही सबसे अच्छा शहर है पढने और जॉब के लिए ...
खैर सब कुछ खेल नज़रिए का ही तो है –हो सकता है किसी को इस शहर ने कडवी यादें दी हों तो कसी को हमेशा के लिए इसे छोड़ने पर मजबूर कर दिया हो ...पर अभी तक मेरे लिए इस शहर के मायने कई हैं .और हर वक़्त पापा के सुरक्षा के घेरे में चलने वाली स्पर्श अब बड़ी हो गयी थी उसे अब हर काम अकेले करना था और ये बड़ा रोमांचक और मजेदार प्रतीत होता था ....और बस इस तरह धीरे धीरे इस शहर से दिल जुड़ गया .....:) J








       

बुधवार, 21 अगस्त 2013

जहाँ डरते हैं लोग घर बसने से,
हम लोगों के आशियां सजाते हैं |

जहाँ डरते हैं लोग फूल  खिलाने से,
हम लोगों के मूर्छे हुए फूल खिलते हैं |

जहाँ डरते हैं लोग मंजिल के रोडों से,
हम अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं |

जहाँ तड़प है डाई आखर प्रेम की,
हम लोगों को भीनी सी मुस्कान दे जाते हैं |

जहाँ इश्क अभाव में दुनिया रोती है,
हम मोहब्बत के पैगंबर बन कर आते हैं |

यहाँ दिल खिलते है,मन मिलते हैं,
बंदी का पता नहीं,बंधुओं का अपार प्यार मिलता है|

हम है सिविल की मचाऊ जनता,
हम से है इस विराट संसार का आकार बनता |

                                                                            - आदित्य झुनझुनवाला