बुधवार, 9 जुलाई 2014

सदाबहार गीत -संगीत

कवितायेँ पढ़ पढ़  कर थोड़ा बोर हो गए ? तो आज पेश है आपके लिए कुछ बेहतरीन गाने आला दर्ज़ की लिरिक्स के साथ ! गाने भी बुनियादी तौर पर  कविता या ग़ज़ल ही होते है ,कुछ पेचदिगियों के साथ , मसलन गानो में तुकबन्दी आवश्यक  होती है। तो देर किस बात की , सुनिये साहिर लुधियानवी , गुलज़ार , प्रसून जोशी , अमिताभ भटटचार्य सरीके गीतकारों की कलम से निकले हुए ये लाजवाब गाने !

1.) Main pal do pal ka shaayar hun / मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी      कहानी हैं .


मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी हैं
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी हैं

मुझ से पहले कितने शायर, आये और आकर चले गए
कुछ आहे भर कर लौट गए, कुछ नग्में गा कर चले गए
वो भी एक पल का किस्सा थे, मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुम से जुदा हो जाऊंगा, वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ

कल और आयेंगे, नग्मों की खिलती कलियाँ चुननेवाले
मुझ से बेहतर कहनेवाले, तुम से बेहतर सुननेवाले
कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे
मसरूफ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक्त अपना बरबाद करे

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला

खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़मे चाहे तो आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को दूना कर गया जो ग़मखार मिला
हमने तो जब...

बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला
हमने तो जब...

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
हमने तो जब...




3.) आगे भी जाने न तू (वक्त -1965) Aage bhi jane na tu (Waqt-1965) 


आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

अनजाने सायों का राहों में डेरा  है
अनदेखी ने हम सब को घेरा है
ये पल उजाला है बाकी अँधेरा है
ये पल गंवाना ना ये पल ही तेरा है
जीने वाले सोच ले, यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

इस पल के जलवों ने महफ़िल संवारी  है
इस पल की गर्मी ने धड़कन उभारी है
इस पल के होने से दुनिया हमारी है
ये पल जो देखो तो सदियों पे भारी है
जीने वाले सोच ले यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

इस पल के साए में अपना ठिकाना है
इस पल के आगे हर शै फ़साना है
कल किसने देखा है, कल किसने जाना है
इस पल से पायेगा जो तुझको पाना है
जीने वाले सोच ले यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..


4.) रु-ब-रु (Robaroo)
सितार में बदल गया
रु-ब-रु रोशनी हे - 2

(धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा) - 2

आँधियों से झगड़ रही है लौ मेरी
अब मशालों सी बढ़ रही है लौ मेरी
नामो निशान रहे ना रहे
ये कारवाँ रहे ना रहे
उजाले में पी गया
रोशन हुआ जी गया
क्यों सहते रहे
रु-ब-रु रोशनी  हे - 2

धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा
रु-ब-रु रोशनी  हे - 2
ए साला - 4
ए साला
अभी अभी हुआ यक़ीन की आग है मुझ में कही
हुई सुबाह मैं चल गया
सूरज को मैं निगल गया
रु-ब-रु रोशनी हे - 2

जो गुमशुदा-सा ख्वाब था
वो मिल गया वो खिल गया
वो लोहा था पिघल गया
खिंचा खिंचा मचल गया


5.) Tu Bin Bataye Mujhe Le Chal Kahi / तू बीन बतायें मुझे ले चल कहीं

तू बीन बतायें मुझे ले चल कहीं
जहां तू मुस्कूरायें मेरी मंझिल वहीं

मिठी लगी, चख के देखी अभी
मिश्री की डली, जिंदगी हो चली
जहां हैं तेरी बाहें, मेरा साहील वहीं

मन की गली तू पुहारों सी आ
भीग जायें मेरे ख्वाबों का काफिला
जिसे तू गुनगुनायें मेरी धून हैं वहीं

6.) आज़ादियाँ - Aazaadiyan 

पैरों की बेड़ियाँ ख्वाबों को बांधे नहीं रे, कभी नहीं रे मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरे, धीरे-धीरे इरादे हरे-भरे, जिनके सीनों में घर करे वो दिल की सुने, करे, ना डरे, ना डरे सुबह की किरनों को रोकें, जो सलाखें है कहाँ जो खयालों पे पहरे डाले वो आँखें है कहाँ पर खुलने की देरी है परिंदे उड़ के चूमेंगे आसमां आसमां आसमां आज़ादियाँ, आज़ादियाँ मांगे न कभी, मिले, मिले, मिले आज़ादियाँ, आज़ादियाँ जो छीने वही, जी ले, जी ले, जी ले सुबह की किरनों... कहानी ख़तम है या शुरुआत होने को है सुबह नयी है ये या फिर रात होने को है आने वाला वक़्त देगा पनाहें या फिर से मिलेंगे दो राहें खबर क्या, क्या पता

7.) नाव - Naav

चढ़ती लहरें लांघ न पाए क्यूँ हांफती सी नाव है तेरी तिनका-तिनका जोड़ ले सांसें क्यूँ हांफती सी... उलटी बहती धार है बैरी के अब कुछ कर जा रे बंधू जिगर जुटा के पाल बाँध ले, है बात ठहरी जान (शान) पे तेरी, हैय्या हो की तान साध ले, जो बात ठहरी जान (शान) पे तेरी, चल जीत-जीत लहरा जा, परचम तू लाल फहरा जा, अब कर जा तू या मर जा, कर ले तैयारी, उड़ जा बन के धूप का पंछी, छुड़ा के गहरी छाँव अँधेरी, छाँव अँधेरी, तिनका-तिनका जोड़... रख देगा झंकझोर के तुझे, तूफानों का घोर है डेरा, भंवर से डर जो हार मान ले, काहे का फिर जोर है तेरा, है दिल में रौशनी तेरे, तू चीर डाल सब घेरे, लहरों की गर्दन कसके डाल फंदे रे, कि दरिया बोले वाह रे पंथी, सर आँखों पे नाव है तेरी चढ़ती लहरें लांघ...

रविवार, 29 जून 2014

अस्तोदय_की_वीणा

श्री रामनरेश त्रिपाठी की उल्लेखनीय काव्य कृति " मानसी"  की अविस्मरणीय रचना "अस्तोदय की वीणा"  जो अति सरलतापूर्ण तरीके से प्रकृति के उदहारण देकर दे जाती आपकी रगों में जोश, कुछ कर गुजरने का। 

बाजे अस्तोदय की वीणा--क्षण-क्षण गगनांगण में रे।
   हुआ प्रभात छिप गए तारे,
   संध्या हुई भानु भी हारे,
यह उत्थान पतन है व्यापक प्रति कण-कण में रे॥
  ह्रास-विकास विलोक इंदु में, 
  बिंदु सिन्धु में सिन्धु बिंदु में,
कुछ भी है थिर नहीं जगत के संघर्षण में रे॥
  ऐसी ही गति तेरी होगी, 
  निश्चित है क्यों देरी होगी,
गाफ़िल तू क्यों है विनाश के आकर्षण में रे॥ 
  निश्चय करके फिर न ठहर तू, 
  तन रहते प्रण पूरण कर तू,
विजयी बनकर क्यों न रहे तू जीवन-रण में रे?

शनिवार, 28 जून 2014

सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

Q1.


कौन - सी दो भाषाओँ के  नाम छिपे हुए  हैं ?
Q2.

इस भाषण के वक्ता कौन हैं और यह कहाँ पर दिया गया था ? यह भाषण यादगार क्यों है ?

Q3. X का जन्म सन् 1934 में नैनीताल में हुआ था । मेरठ कॉलेज से B.Sc. करने के बाद, इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्याला से अपनी M.Sc. और Ph.D. की डिग्रियाँ हासिल कीं । यह अपना भौतिकी का शोध पत्र हिंदी में लिखने वाले पहले इंसान थे । बाद में जाकर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्य अंग और देश के मानव संसाधन मंत्री भी बने ।  
X कौन हैं ?
Q4.

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कौन से शब्द छुपे हुए हैं ? सिर्फ एकदम सटीक उत्तर ही मान्य होगा ।


Q5.


 किस कंपनी के विज्ञापन के बोल हैं यह ?

शुक्रवार, 27 जून 2014

आग जलती रहे

दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध कविता 'आग जलती रहे' ; जिंदगी में कितने ही संघर्ष भरे दिन आते हैं , कितने ही अग्नि परीक्षाओं में हमें सफल होना पड़ता है , परन्तु सफलता हमारे कदमों में तभी शरण लेती है जब तक सही वक़्त नहीं आता , इंसान की सोई हुई चेतना नहीं जागती !

एक तीखी आँच ने
इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
हाथों से गुजरता कल छुआ
हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
जो मुझे छुने चली
हर उस हवा का आँचल छुआ
प्रहर कोई भी नहीं बीता अछुता...
आग के संपर्क से
दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
मैं उबलता रहा पानी-सा
परे हर तर्क से
एक चौथाई उमर
यों खौलते बीती बिना अवकाश
सुख कहाँ
यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
छानता आकाश
आह! कैसा कठिन
कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

गुरुवार, 26 जून 2014

Dimag Lagai Sasura #1




घर / इंस्टी में बैठे बैठे बोर हो रहे है ? क्या आपको ऐसे सवाल अच्छे लगते है जो आपके दिमाग के पुर्ज पुर्जे को हरकत में ला दे ? क्या आप दिमागी  मेहनत करके अपने समय का सदुपयोग करना चाहते है ? तो फिर आप सही पोस्ट पढ़ रहे है , पेश है आप के लिए कुछ सवाल।  इन प्रश्नो का उत्तर आप कमेंट बॉक्स में किसी भी भाषा में  दे सकते है।

1    पृथ्वी पर  ऐसी खास जगह मौजूद है जहाँ अगर आप एक मील दक्षिण चलने के बाद एक मील पूर्व  चले और फिर एक मील उत्तर चले तो आप अपने आप को उसी जगह पाएंगे जहाँ से आपने अपनी यात्रा आरम्भ की थी !! क्या आप ऐसी जगह के बारे में सोच सकते है ? क्या ऐसी एक  से ज्यादा जगह हो सकती है?


2     आप एक सड़क जंक्शन  पर हो , एक रास्ता आपको  गंतव्य  तक  ले जाता है जबकि दूसरा एक ऐसी जगह जहाँ आपका मरना निश्चित है। जक्शन पर तीन लोग मौजूद है एक सदैव सत्य बोलता है , एक हमेशा झूठ बोलता है और एक झूठ और हकीकत के बीच बारी  बारी से झूलता है। लेकिन ज़ाहिर है आपको नहीं मालूम की  कौन सा व्यक्ति क्या है (सच्चा , झूठा )  . आप रास्ते  का पता लगाने के लिए २ प्रश्न पूछ सकते है , आप क्या पूछेंगे ?


3    १०० चींटियाँ एक आयामी सतह ( १ डिमेन्शंसनल प्लेन )  पर आगे बढ़ रही है।  सभी एक ही गति से  चल रही है , कुछ पॉजिटिव x एक्सिस तरफ तो कुछ नेगेटिव x एक्सिस तरफ। एक टक्कर दो चींटियों के बीच होता है तो दोनों चींटियों की  दिशा बदल जाती है। अगर आप को प्रत्येक चींटी की चलने की दिशा मालूम है तो आप किस प्रकार टकराव की संख्या की गणना कर सकते है ?


4    एक  मेज़ पर १०० सिक्के मौजूद हैं, जिन्हेँ  अगर ऊपर की ओर से देखें तो ५० सिक्के हेड फेस  कर रहे है और बाकी ५० टेल फेस  कर  रहे है। आप  की आँखों  पर पट्टी बंधी है  और आप  किसी  भी  तरीके से , मसलन रगड़कर इत्यादि , सिक्के की स्तिथि को ज्ञात  नहीं  कर सकते। आपको इन १०० सिक्को  को २ हिस्सों में इस प्रकार विभाजित करना है की  दोनों  हिस्सों में टेल फेस करने वाले सिक्कों  की संख्या बराबर हो।

बुधवार, 25 जून 2014

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक अद्भुत कविता : 'रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद' । जीवन की अनेक दृष्टियोँ को ध्यान मेँ रखकर इस कविता को पढ़ने से कई सत्य एवं लक्ष्य सामने आते हैँ। कितनी खूबसूरती के साथ दिनकर जी ने मानव के भावों एवं स्वप्नों का इस कविता में वर्णन किया है :

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।
मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

सोमवार, 23 जून 2014


Dialogue kyun maar rahe ho, yaar?

निम्नलिखित चित्रों के अनुकूल बॉलीवुड के प्रचलित dialogues सोचें और iitbvaaniblog@gmail.com पर हमें भेज दें । समय - समय पर हर पहेली के विजेताओं की घोषणा की जाएगी ।

1)

2) 

3) 

4) 

5) 

6) 

7) 

8) 

रविवार, 20 अप्रैल 2014

आहत

[ मैंने यह कविता करीब ६-७  वर्ष पूर्व एक कवि सम्मेलन से लौटने के पश्चात प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी थी. वर्तमान में जब मीडिया की  निष्पक्षता सवालों के घेरों में हैं, कवियों एवं लेखको के एकपक्षीय विमर्श को  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सभी आयामों का सम्मान करते हुए  भी कटघरे में  खड़ा करने की आवश्यकता है .] 


चौबीस घंटे के पश्चात्
रह रह कर मेरा मन कर रहा व्याघात  
वहां मैंने सुनी बहुतेरे कवियों की बात
कुछ ने हास्य - व्यंगयों से सभा का श्रृंगार किया, 
कुछ ने अपनी प्रतिभा से पाकिस्तान पर प्रहार किया,
कुछ ने गुजरात दंगो पर अपना विचार दिया
यहीं है वह बात
जहाँ रह रह कर , मेरा मन कर रहा व्याघात
इन चंद कवियों को बहुत याद आई
जलते हुए साबरमती एक्सप्रेस की
लेकिन , इनकी आँखों में नहीं बची थी इतनी दृष्टि
इनके नाकों में नहीं बची थी , इतनी घ्राण शक्ति ,
जो नरोदा पटिया की सडती लाशों की बू को भी सूंघ पाते
उनके कानो में नहीं बची थी , इतनी श्रवण शक्ति ,
जो गुलमर्ग सोसाइटी के क्रंदन को भी सुन पाते,
इसी तरह जब मैं पढ़ता हूँ ,
‘हंस’ के काव्य भाग को ,
तो इन पृष्ठों पर नहीं पाता, एस-६ डब्बे की बात
उनकी संवेदनाये , मानवीय भावनाये
सारी तुकबंदी एवं काव्यात्मक उपमाये
प्रारंभ होती है , गोधरा के पश्चात्
यही है वो बात ,
जहाँ रह रह कर, मेरा मन कर रहा व्याघात
मैं पूछता हूँ ,
क्या जलती आग की लपटों से
उठने वाली मासूम चीखों में भी अंतर होता है .
या फिर अंतर होता है ,
इंसानों को जलाने के लिए प्रयुक्त होने वाली पेट्रोल में,
नहीं कोई अंतर नहीं  होता, तो फिर क्यों,
इस आग पर सेंके जाने वाले राजनीति की रोटियों की तर्ज पर ,
कवियों की संवेदनाये और भावनाए रंग बदल लेती है.
फिलहाल , मुझे इन कवियों की कविताओ से ज्यादा इन्तजार है,
किस्से के उस लड़के की जो,
एक मूर्ख  और नग्न राजा की सवारी में ,
दुदंभी नाद और जयघोष के बीच,
बड़े ही अबोधता  से सहज कह उठे
“अरे राजा तो नंगा है “
हाँ,  इस बात की सम्भावना बहुत ज्यादा है,
उस लड़के के परिजन उसके मुहं पर हाथ डालते हुए कहें 
“अबे, चुप हो जा ,यदि राजा के कानो तक,
पहुँच गयी यह बात,
मिल जायेगा प्राणदंड बातों ही बात “
                                  - नेपथ्य निशांत 


सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

एक छुपी कहानी

हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !
सिमटी हुई सी,
कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !
सिमटी हुई सी,

कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी !
झांकते है कुछ लम्हे कुछ यादे,
उन सिलवटो और निशानों से !
और सुनाते हें एक कहानी उस सफर की,
जो उसके धुलने के साथ ही  भुला दिया जाएगा !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !!
.
.
राजू का मिटटी से सना स्कूल का नीला शर्ट
बता रहा हें कि आज उसने खेला है फुटबाल
क्लास छोड़ कर !
कुछ भीगी सी आस्तीने गवाह हें
कि पसीना फिर उसने बाज़ुओ से ही पौछा है !
.
पड़ोस कि आंटी की
लखनवी डिजाईनर साड़ी पर लगे सब्जी के निशान
बता रहे है भोज में आये मेहमानों कि भूख को !
रोज़ मोहल्ले का डान बनकर घूमने वाले
महेश कि शर्त फटी हुई हें आज,
वो पिट कर लौट रहा है या हवालात से !
.
बड़े भैया के एक बाजू से
महक रहा है जनाना इत्र,
उस लड़की का
जिसके हाथ थाम जनाब सिनेमा देख आये हें !
पिताजी का सिलवटो और पसीने से भरा शर्ट
हिसाब देता हें उन पैसो का,
जो हम बेफ़िक्री से उड़ाते हें !
माँ की साड़ी में गंध और कालिख हें कोयले की,
लगता हें गैस फिर खत्म हो गई है !
आज फिर रोटी खानी होगी चूल्हे की !
.
मेरे दोस्त के टी शर्ट में बू हें धुए की सी,
शायद कही गली में छुप कर वो सिगेरेट सुलगाता होगा !
दादाजी कि उस पुरानी धोती से एक अजीब गंध आती हें
शायद तजुर्बे कि महक होगी !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
.
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चौराहे पर बैठे उस बूढ़े भिखारी का फटा कुर्ता
दशको से नहीं धुला,
उसमे छुपी हें अनगिनत सच्चाइयाँ
और लाचारी भरे लम्हे कई,
पर मोटे उपन्यासों को पढ़ने का वक्त किसी के पास नहीं !
पहाड़ के उस पुराने मंदिर में
जहा अब कोई नहीं जाता
एक ध्वजा लहराती हें,
कहती हें कहानी उन दिनों कि
जब इंसा इतना नास्तिक न था !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
.
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अक्सर ये कहानिया वक्त बा वक्त धो दी जाती हें
एक नई इबारत लिखने को,
पर कुछ कहानियों को संजोया जाता हें सुनाने को !
जैसे कि मेरी अलमारी बड़े जतन से रखा वो रुमाल
जो फिरंगी मेम का चुराया था,
मानो महक आती हें उसमे परदेस की !
हाँ! और जैसे वो ‘मफलर’
जो भैया को उनकी सहेली ने दिया था शायद,
छूने भी नहीं देता किसी को
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें
.
.
लेकिन अलमारी में बिलकुल पीछे,
एक फौजी वर्दी टंगी हें चचाजान की !
घर के बड़े कभी कभी अकेले में
उसे देख कर रो लिया करते हें !
उस वर्दी पर आखिरी कहानी के शायद कुछ ज़ख्म बचे है
अब उसकी सिलवटो में कोई नई कहानी नहीं भरता
क्योंकि उन हरी स्लेटी सतहो लिखने वाला
लंबी छुट्टियों पर गया हें !!
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

आईये ! और बचपनों को सुनहरा बनाएं ! :)

पता है 'चिल्ड्रन्स डे ' है तो सब हमेशा की तरह फिर से नोस्टैल्जिक हो जायेंगे .क्या करें सबसे प्यारा बचपन ही तो होता है .न कोई टेंशन .न कोई प्रेशर .पर कुछ लोगों के लिए यही बचपन बेहद खौफनाक होता है .बेहद बुरी ,कडवी यादों से जुड़ा होता है क्यूंकि यही वो अवस्था भी होती है जब हम मासूम ,कमज़ोर और दुनिया की रीत से हटके होते हैं ....और इसीलिए हमारे इसी भोलेपन का फायदा या तो समाज या परिस्थितियाँ उठा लेती हैं .पर अब आप समर्थ हैं .कम-से -कम अगर आपका बचपन परफेक्ट नही रह पाया तो आप ऐसे अनगिनत बच्चों का बचपन सँवारने में मदद तो कर सकते हैं न .

एक और बात जो वैसे तो व्यक्तिगत राय है पर शायद काफी सारे लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि इस दुनिया में इतने सारे बच्चे 'बिन माँ -पापा ' के ज़िन्दगी गुजारते हैं .और हमारे यहाँ हम बस 'अपना खून अपना ही होता है ' का बड़ा ही बेसुरा राग अलापते रहते हैं .उनसे पूछिए जो अपनी संतान के सुख के लिए तड़पते रहते हैं ,उनके लिए ये बच्चे ही रौशनी लाते हैं . फिर क्यूँ खुद अपनी औलाद को जनम देना हमारे यहाँ अति आवश्यक समझा जाता है .शादी होने के बाद ही समाज का सारा दारोमदार अपने कन्धों पर ढोने वाली तथाकथित आंटियाँ कैसे जब देखो तब शुरू हो जाती हैं ....खुशखबरी कब सुना रही हो .गोया कि अब ज़िन्दगी में खुशखबरी के लिए और कोई वजह ही नही है!! और कैसे बच्चा गोद लेने पर समाज तो छोडिये परिवार भी नाक भौंह सिकोड़ता है .क्यूँ ? बच्चे का खून का रंग सफ़ेद तो न हो जाएगा और वैसे भी बच्चा आपकी परवरिश पर निर्भर करेगा .फिर क्यूँ हम ये खून का मोह पालते बैठते हैं .जानते हैं हम जबकि कि अपने खून पर तो बरसों से भरोसा पालते आये हैं पर वे ही खून के आंसू रुला देते हैं कई बार .तो एक बार प्यार और अपनेपन को तरसती इस नन्ही सी जान को अपने आँगन में पालकर तो देखिये .कैसे ज़िन्दगी भर आप के एक बूँद प्यार के बदले आप पर प्रेम और सम्मान की बरसात करेगा . 

और आप से इसलिए यह बात कर रही हूँ क्यूंकि आप से नही तो किससे!! आप नयी पीढ़ी के हैं .आप शुरुआत करेंगे तो आप को देखकर और लोग आगे आयेंगे और आप राज़ी होंगे तो आपके परिवार वालों को भी आप राज़ी कर ही लेंगे !! हाँ पर एक ज़िन्दगी रोशन करने का मतलब ये नही कि अब और किसी रोते और मायूस बच्चे के चेहरे पर खुशियाँ नही बिखेरने की कोशिश करेंगे .क्यूंकि एक को तो आपने कहीं न कहीं अपने लिए अपनाया (खुशियों का एक्सचेंज म्यूच्यूअल होता है भई !  ) पर यहाँ पर आपका इंसानी फ़र्ज़ ,एक समर्थ होने का फ़र्ज़ ख़तम नही हो जाता !!